Friday, September 30, 2022
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Desh-Videsh: श्रीलंका एक एहसान फरामोश और स्वार्थी देश हैं-

Desh-Videsh: श्रीलंका एक एहसान फरामोश और स्वार्थी देश हैं- श्रीलंका पिछले कुछ महीनों से दिवालिएपन को झेल रहा है, वहां पर तेल और गैस की कमी तो है ही लोगों को खाना-पीना तक नसीब नहीं हो रहा है।

श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो चुका है और वह इस समय पूरी तरह से कंगाल हो चुका है। ऐसे में न तो विश्व बैंक ने और न ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने उसकी मदद की और उसके सरपरस्त देश चीन ने तो श्रीलंका को फूटी कौड़ी तक नहीं दी। लेकिन भारत ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए मुसीबत में फंसे श्रीलंका को दवाइयां, तेल और खाद्य सामग्री भेजकर और 4 अरब डॉलर की क्रैडिट लाइन का ऋण देकर उसकी मदद जरूर की।

वर्तमान में श्रीलंका में भारतीय हाईकमिशन श्रीलंका के राजनीतिक दलों के साथ मिलकर तेजी से वहां के हालात सुधारने के लिए काम कर रहा है। श्रीलंका की तरफ से जिस तरह की मदद की मांग भारत से होती है भारत तुरंत उस दिशा में काम करने लगता है। इसके चलते श्रीलंका की जनता का नजरिया भारत को लेकर जरूर बदला और वहां की जनता भारत को अपना हितैषी और मुसीबत में काम आने वाला मित्र देश मानने लगी।

कोरोना महामारी के दौरान भी भारत ने श्रीलंका को अन्य औषधियां भेजने के साथ-साथ वैक्सीन मैत्री मुहिम के तहत 5 लाख कोविड वैक्सीन श्रीलंका को उपहार स्वरूप भेजी थी। भारत को इस बात की पूरी उम्मीद थी कि जैसी मदद वह इस समय श्रीलंका की कर रहा है, श्रीलंका की चिंता को समझते हुए बुरे समय में उसका साथ दे रहा है, तो श्रीलंका भी भारत के हितों का ध्यान रखते हुए ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा जो भारत के विरुद्ध जाएगा। खासतौर पर अगर बात भारत की सुरक्षा से संबंधित है तो श्रीलंका उसका खास ख्याल रखेगा।

राजपक्षे बंधुओं के श्रीलंका से भाग जाने के बाद रनिल विक्रमसिंघे ने वहां की कमान संभाली, लेकिन विक्रमसिंघे ने भारत से मदद लेने के बावजूद भारत के हितों का ध्यान नहीं रखा। भारत के लाख मना करने के बावजूद विक्रमसिंघे ने चीन की नौसेना रिसर्च वेसेल को हम्बनटोटा बंदरगाह पर आने के लिए अपनी रजामंदी दे दी, यह जानकारी श्रीलंका की सेना के प्रवक्ता की तरफ से मीडिया को दी गई।

ऐसा लगता है कि रनिल विक्रमसिंघे और श्रीलंका के राजनीतिज्ञ एहसान फरामोशी पर उतर आए हैं। भारत को इस बात पर आपत्ति है कि श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर श्रीलंका ने युआन वांग-5 नाम के एक चीनी रिसर्च वेसेल को आने की अनुमति दे दी क्योंकि यह चीनी वेसेल साधारण वेसेल नहीं है बल्कि अंतरिक्ष यानों का टोही जहाज है। इस वेसेल में ऐसे बहुत सारे राडार और दूसरे ट्रैकिंग उपकरण लगे हुए हैं जिससे इसे चीन का जासूस शिप या जहाज बोला जाता है। चीन के युआन वांग-5 नाम के इस वेसेल को हम्बनटोटा बंदरगाह पर भेजने का लक्ष्य बहुत संदिग्ध है जो पूरी तरह से भारत के खिलाफ जाएगा। चीन दूसरे देशों के सैन्य विमानों और अंतरिक्ष यानों पर नजर रखने के लिए अपने रिसर्च वेसेल का इस्तेमाल करता है।

श्रीलंका का हम्बनटोटा गहरे पानी वाला बंदरगाह है जिसका रणनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है। इस बंदरगाह को चीन के ऋण से बनाया गया है और अब यह 99 वर्ष के लिए चीन के पास पट्टे पर रहेगा। अपनी इस हरकत पर सफाई देते हुए श्रीलंका सेना के प्रवक्ता कर्नल नलिन हेरथ ने मीडिया को बताया कि समय समय पर श्रीलंका बहुत सारे देशों के व्यापारिक और सैन्य जलपोतों को अपने जलक्षेत्र से जाने और आने की अनुमति पहले से देता रहा है।

चीन का युआन वांग.5 नाम का यह रिसर्च वेसेल 11 से 17 अगस्त तक श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर रुकेगा। इस दौरान यह वेसेल हिन्द महासागर के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के ऊपर उपग्रहों की टोह लेने, उपग्रहों पर शोध और उनपर नियंत्रण का काम करेगा। इस काम के लिए यह वेसेल सितंबर में एक बार फिर हम्बनटोटा बंदरगाह पर आएगा। इस वेसेल पर बहुत शक्तिशाली राडार और डिश एंटीना लगे हैं, इस वेसेल में कमांड, कंट्रोल और सूचना संयंत्रों के साथ सूचना के आंकड़े जुटाना, निगरानी करना और सैन्य परीक्षण करने की पूरी सुविधाएं मौजूद हैं। युद्ध और युद्ध जैसी स्थिति में यह वेसेल चीन की सेना के लिए एक चलते-फिरते कमांड केन्द्र की तरह काम कर सकता है।

भारत ने श्रीलंका से इस चीनी वेसेल को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी लेकिन श्रीलंका ने जो इस समय भी कंगाली से जूझ रहा है और भारत से मदद भी ले रहा है उसने भारत की चिंताओं को दरकिनार कर चीन के युआन वांग-5 वेसेल को हम्बनटोटा बंदरगाह पर आने की अनुमति दे दी है। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे परिस्थिति क्या मोड़ लेती है। लेकिन अपनी हरकत से श्रीलंका ने दिखा दिया है कि वह एक एहसान फरामोश और स्वार्थी देश है जो सिर्फ अपने बारे में सोचता है, उसमें जरा-सी भी नैतिकता नहीं बची है।