Inspirational Story: राजा और बकरे की कहानी! जिसे पढ़कर बदल जायेगी आपकी दुनिया

Written by Deepak

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Inspirational Story: राजा और बकरे की कहानी! जिसे पढ़कर बदल जायेगी आपकी दुनिया, हमारे जीवन में कई सारी कठिनाइया आती है लेकिन उसका हल भी उसी में होता है। सिर्फ हमें सही दिशा देने वाला होना चाहिए। ऐसे ही कुछ कहानियाँ होती है जो हमें कोई न सबक सीखकर जाती है। ऐसी ही कहानी हम आपके लिए लेकर आये है जिसे पढ़कर आपके जीवन में बदलाव आ सकता है। यह एक राजा और बकरे की कहानी है जिसे पढ़कर आपका नजरिया बदल देगा। आइये पढ़े यह कहानी।

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राजा और बकरे की कहानी!

बहुत समय पुरानी बात है एक राज्य में एक राजा के पास में एक सुंदर सा बकरा था जिसे वह बहुत लाड़ करता था और उसे हर दिन हरी-हरी घास और सुगंधित हलवा खिलाया करता था। एक उसके दिमाग में एक आईडिया आया और उसने पूरे राज्य में एलान कर दिया कि जो भी इस बकरे को खिलपिलाकर तृप्त कर देगा उसे में हजार स्वर्ण मुद्राएं दुगा। लेकिन बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा। ऐसा सुनते ही एक व्यक्ति आया कहा कि इस बकरे को तृप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है और वह उस बकरे को जंगल की तरफ ले गया। और उसे दिनभर घास खिलाई। और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है, अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ। बकरे के साथ वह राजा के पास गया।”

Inspirational Story: राजा और बकरे की कहानी! जिसे पढ़कर बदल जायेगी आपकी दुनिया

“राजा ने थोड़ी सी हरी घास और सुगंधित हलुआ बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा। इस पर राजा ने उस व्यक्ति से कहा की तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह क्यों खाने लगता। इसके बाद बहुत से लोगो ने बकरे को पेट भर खाना खिलाने की कोशिश की लेकिन रिजल्ट हमेशा जीरो ही रहा। दरबार में सबके सामने घास और हलुआ डाली जाती की वह फिर खाने लगता।”

“एक संन्यासी उस राज में ठहरा हुआ था,उनने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है। उसने सोचा मैं युक्ति से काम लूँगा और उस बकरे के प्रकृति के बारे में अध्ययन करता रहा। कुछ दिन उपरांत वो राजा के पास गया और बकरे को अपने साथ लेकर जंगल गया। जंगल में एक युक्ति भिड़ाई, फिर जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से पिटाई कर देता, जितने बार जाता और ज्यादा पिटाई करता, पिटाई का पैमाना बढ़ता जाता। सारा दिन ऐसा कई बार हुआ। अंत में बकरे ने सोचा की यदि मैं खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी,फिर तो बिना खाए चुप चाप खड़ा रहा।”

“शाम को वह संन्यासी बकरे को लेकर राज दरबार में लौटा। बकरे को उसने कुछ नहीं खिलाई थी, फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है। अत: यह अब बिलकुल नहीं खायेगा, आप परीक्षा कर लीजिये। राजा ने बकरे के सामने सुगंधित हलुआ और कोमल कोमल घास डाली, लेकिन यह क्या? उस बकरे ने उसे खाना तो दूर, देखा और सूंघा तक नहीं। बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी की कुछ भी खाऊंगा तो मार पड़ेगी,अत: कुछ नहीं खाया।”

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इस कहानी से क्या सीख मिली?

यही बकरा हमारा मन है। बकरे को घास चराने ले जाने वाला हमारा जीवात्मा। राजा परमात्मा है। मन कभी तृप्त नहीं हो सकता। एक इच्छा पूर्ण होते ही दूसरा जागृत होता है, भूख कभी शांत नहीं होगी। मन का अगर नियमन किया जाय,मन पर अगर अंकुश रखा जाय तो मन हमारे इच्छाओं के विरुद्ध नियंत्रण में होगा। मन को विवेक रूपी लकड़ी से रोज सीख दी जाए तो वह अपने वासनाओं, इच्छाओं से परे होगा और यह केवल अपने तृप्त होने के कारण को जानने से होगा,वह जानना केवल ध्यान के द्वारा अपने अंदर के खोज से ही संभव होगा। तब त्यक्त मन में त्याग उत्पन्न होगा यही तृप्ति है।

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